समानुभूति : पापा यू आर ग्रेट

बाहर मौसम बहुत सुहावना था। ठंडी हवा थी, पक्षी चहचहा रहे थे, मगर शीना के आंसू थे कि रुक ही नहीं रहे थे। उसकी सहेली संगीता अपने माता-पिता के साथ गांव वापस जा रही थी। उसके पापा की नौकरी छूट गई थी। घर का किराया और संगीता की फीस देने के लिए भी पैसे नहीं थे।

कहां तो दोनों स्कूल में ‘डबल एस के नाम से जानी जाती थीं। पढऩे-लिखने, खेलने-कूदने में सबसे आगे। इन्हें देखकर बाकी बच्चे कहते कि सारे के सारे इनाम तो यही दोनों ले जाती हैं। और किसी को तो कुछ मिलता ही नहीं है।

संगीता के पापा नौकरी करते थे, जबकि शीना के पापा की फैक्ट्री थी। दोनों सहेलियों में बहुत प्यार था। परिवारों का एक-दूसरे के घर आना-जाना भी था।

शीना ने बहुत कोशिश की थी कि संगीता को कैसे भी रोक ले। उसने मम्मी से कहा था, ‘क्या संगीता को हम अपने घर में नहीं रख सकते?

मम्मी बोलीं, ‘रख सकते हैं। मगर दूसरे के बच्चे की जिम्मेदारी बहुत बड़ी होती है। कुछ ऊंच-नीच हो जाए, तो क्या होगा।

-‘क्या ऊंच-नीच?

-‘अभी तुम नहीं समझोगी। बच्ची हो।

‘कभी कहती हो कि अब मैं बच्ची नहीं रही और कभी कहती हो कि बच्ची हूं। – संगीता ने नाराजगी से कहा था।

और अब संगीता के जाने का दिन भी आ गया। दोनों मम्मियां भी एक-दूसरे के गले मिलकर रो रही थीं।

संगीता के जाने के बाद शीना का स्कूल में बिल्कुल मन नही लगता था। कभी-कभी वह मम्मी के फोन से उसे फोन करती। संगीता भी वहां बहुत उदास थी। मम्मी-पापा शीना की उदासी का कारण जानते थे, लेकिन समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें।

शीना अकसर मम्मी से शिकायत करती कि वह चाहतीं तो संगीता को रोक सकती थीं। एक दिन मम्मी ने कहा- ‘वह रहती कहां? उसके लिए हमें अलग से कमरा बनवाना पड़ता।

-‘मैं अपने कमरे से पलंग हटाकर जमीन पर बिस्तर लगा लेती। हम दोनों साथ-साथ पढ़ते, साथ-साथ स्कूल जाते, खेलते, कितना अच्छा लगता।

यह सुनकर पापा बोले-‘क्या वह अपने मम्मी-पापा को छोड़कर हमारे साथ रह लेती। बाद में उनकी याद में रोती तो?

‘तो मैं अंकल-आंटी को फोन कर देती। वे आकर मिल जाते। छुट्टियों में संगीता उनके पास चली जाती। लेकिन अब क्या हो सकता है। आप मुझे उसके पास भेज दीजिए।

-‘वहां गांव में तो अच्छा स्कूल भी नहीं। कहां पढ़ोगी?

-‘जहां वह पढ़ती होगी।

उसकी बात सुनकर मम्मी बोलीं- ‘ऐसी दोस्ती तो पहली बार देख रही हूं कि सहेली के लिए हमारी बेटी हमें भी छोडऩे को तैयार है।

इतवार का दिन था। सात बज गए थे, मगर शीना अभी सो रही थी। तभी उसे लगा कि किसी ने उसे पुकारा है।

‘अरे, यह तो संगीता की आवाज है। ओफओह, अभी तक सपना देख रही हूं। संगीता यहां कहां।

लेकिन तभी किसी ने उसे झकझोरा। शीना ने आखें खोलकर देखा तो सचमुच वही खड़ी थी। शीना झटके से उठी तो रजाई एक तरफ गिरी। पूछा-‘तू यहां कैसे? किसके साथ आई?

-‘मम्मी-पापा के साथ।

-‘कब तक रहेगी?

-‘हमेशा के लिए।

शीना शोर मचाते हुए उसके गले से लग गई- ‘सच्ची। सच कह रही है। तभी उसकी नजर संगीता के मम्मी-पापा पर पड़ी। वे मुस्कुरा रहे थे। उसकी मम्मी ने आकर शीना के माथे को चूमा। सिर पर हाथ फेरा।

शीना दौड़कर बाहर गई तो पापा बोले-‘आज कितने दिन बाद इसके चेहरे पर हंसी आई है।

जब तक किराए का घर नहीं मिला संगीता और उसके मम्मी-पापा वहीं रहे। अब फिर से सहेलियां साथ-साथ स्कूल जाने लगीं। खेलने-कूदने लगीं। स्कूल में ‘डबल एस की वापसी हो गई।

एक शाम अभिषेक अंकल आए तो पापा से बोले-‘यार थैंक्यू। तुमने मि. वर्मा को हमारे यहां भेजा। इतनी जल्दी उन्होंने सारी जिम्मेदारी संभाल ली है कि अब मुझे किसी बात की चिंता नहीं रही।

शीना उनकी बात सुन रही थी, उसने चुपके से मम्मी से पूछा-‘ये मि. वर्मा कौन हैं?

‘तुम उन्हें नहीं जानतीं शायद। – फिर वह जोर से हंसने लगीं।

उन्हें हंसते देख पापा बोले-‘हां, यह मि. वर्मा को भला क्या जाने। यह तो संगीता के पापा को जानती है।

-‘ओह पापा, मुझे क्यों नहीं बताया कि उन्हें आपने बुलाया है?

-‘भाई, क्या करते। अपनी बेटी को उसकी सहेली से दूर कैसे रखते। रोती रहती न बेचारी।

-‘थैंक्यू पापा। यू आर ग्रेट।

क्षमा शर्मा

रामचरित मानस की सीख

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहिं बिलोकि पातक भारी।।
निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना।।

जिन्ह के अस मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई।।
कुपथि निहारि सुपंथ चलावा । गुन प्रगटै अबगुनन्हिं दुरावा ।।

जो अपने मित्र के दुख से दुखी न हो, ऐसे व्यक्ति का मुख देखने में भी पाप लगता है। मित्र का कर्तव्य होता है कि वह अपने दुख के पहाड़ को भी नन्हे रज कण के समान साधारण माने और अपने प्रिय मित्र के छोटे रजकण के समान कष्ट को भी पहाड़ के समान जाने और उसके कष्ट का समाधान करे। ऐसा मित्र ही मित्र कहलाने योग्य होता है। मित्र विश्वास विषयक संबंध है। मित्रता एक आदर्श भी है, परंतु अत्यन्त गंभीर और संवेदनशील भी। सुमित्र वही है, जो अपने मित्र को कुपंथ से हटाकर सुपंथ की ओर ले जाने का प्रयास करे और एक संत की तरह उसकी बुराइयों को छुपाने और गुणों को सार्वजनिक करने का पुण्य कार्य करे। कर्ण यदि चाहता तो वह दुर्योधन को भी अपनी निजी धातुगत चरित्र संपदा की ओर मोड़ सकता था, पर उसने मित्रता का बिल्कुल उल्टा अर्थ जीवन में स्वीकार कर लिया और न केवल अपने और मित्र दुर्योधन के विनाश का कारण भी बन गया, मित्रता का कार्य श्री कृष्ण ने कौन्तेय – अर्जुन के साथ किया। जिसमें न केवल उसको मोह से ऊपर उठाया, बल्कि धर्मयुद्ध में प्रवृत्त करके ज्ञान, भक्ति, कर्म और कर्म से संन्यास का उपदेश देकर ऐसी दिव्यता दे दी कि पांडवों से जीवन में कोई अनैतिक कृत्य जीवन में नहीं हुआ। भगवान राम और भगवान कृष्ण दोनों ने अपने मित्र विभीषण और अर्जुन को मित्र बनाकर उनका दुख तो हर ही लिया, पर न तो राम ने लंका पर राच्य किया, और न ही कृष्ण ने हस्तिनापुर पर।