कर्तव्यपरायण | दोनों बन गए दोस्त

स्कूल की छुट्टी हुई थी। रश्मि बाहर निकलीं कि तेज बारिश होने लगी। बचने के लिए वह ऊंचे नीम के पेड़ के नीचे खड़ी हो गईं। सारे बच्चे भीगते हुए भी अपने-अपने घरों की ओर दौड़ रहे थे। बहुत-से स्कूल बसों, अपने माता-पिता की बाइक्स, कारों या रिक्शों में जा रहे थे। एक बच्चे ने पिता की गाड़ी रुकवाकर कहा भी- ‘मैम आ जाइए। मगर रश्मि ने धन्यवाद देकर कहा कि ‘पास ही तो जाना है।

जब बारिश थम गई, तो वह आगे बढ़ीं। तभी उन्हें हलकी- सी आवाज सुनाई दी। इधर-उधर देखा तो एक नन्हा पिल्ला दिखाई दिया। बारिश से पूरी तरह भीगकर, वह रेंगता हुआ सड़क की तरफ बढ़ रहा था- ओह, सड़क पर तो यह किसी वाहन के नीचे कुचल जाएगा। रश्मि को दया आ गई। इसकी मां कहां गई। क्या पता कहीं से देख रही हो, इसे उठाएं तो आकर काट न ले। क्या करें। घर ले जाएं तो इसे पालेंगी कैसे। लेकिन उसे इस तरह से मरने के लिए भी तो नहीं छोड़ सकतीं। रश्मि ने उसे अपनी साड़ी के पल्लू में छिपाया और घर ले आईं। घर में दोनों बच्चों, नक्षत्र और स्वस्ति ने नन्हे पिल्ले को देखा, तो वे बहुत खुश हुए। पिल्ले को रश्मि ने बांस की टोकरी में कपड़ा बिछाकर रखा। सूखे कपड़े से पोंछा। कपड़े बदलकर, एक कटोरी में दूध लाईं। रुई की मदद से वह पिल्ले को दूध पिलाने लगीं और वह कुचुर-कुचुर करके पीने भी लगा। तभी घर की पालतू बिल्ली पूसा आई। उसने पिल्ले को पास आकर सूंघा और मुंह से अजीब-सी आवाज निकाली। जैसे कह रही हो-उसकी जगह लेने यह कौन आ गया। तब रश्मि ने उसे समझाते हुए कहा- ‘पूसा, इससे कुछ नहीं कहना है, समझीं।

पूसा ने गोल आंखों से उन्हें देखा और कूदकर उनकी गोद में आ बैठी कि यह जगह तो बस उसके लिए ही है। रश्मि के पति सुरेंद्र ने देखा, तो हंसते हुए बोले- ‘तुम्हें तो सड़क पर कुछ भी मिल जाए, उसे घर उठाकर ले आती हो। पहले इस बिल्ली को ले आईं और अब यह पिल्ला। लगता है, अपना घर जल्दी ही एक चिडिय़ाघर बन जाएगा।

-‘क्या करती, अगर ये मर जाता तो?
बच्चों के लिए पिल्ला नया खिलौना था। स्वस्ति ने उसकी बंद आखें देखकर कहा- ‘इसकी आंखें तो बंद हैं। देखेगा कैसे?
रश्मि ने समझाया- ‘जल्दी ही खुल जाएंगी। पूसा की आंखें भी तो बंद थीं, याद नहीं।

‘इसका नाम क्या रखें?
स्वस्ति ने उसे गोद में उठाते हुए कहा। नक्षत्र बोला- ‘इसका नाम है, मंकी।
– ‘मगर बंदर नहीं, यह तो पिल्ला है।
– ‘तो क्या हुआ। हम तो इसे मंकी ही बुलाएंगे।

लेकिन पूसा तो घोर नाराज। रश्मि या बच्चे, जब भी पिल्ले को छुएं, वह दौड़ी आती और उनके आसपास घूमने लगती। जल्दी ही मंकी रेंग-रेंगकर पूरे घर में घूमने लगा। वह कटोरी से खुद ही दूध पीने लगा।  बच्चे उसे उठाए घूमते। रश्मि स्कूल जाने से पहले जैसे बच्चों का टिफिन पैक करतीं, उसी तरह पूसा और मंकी के लिए दूध में भिगोकर रोटी या ब्रेड अलग-अलग कटोरियों में रखतीं। कभी नक्षत्र, तो कभी स्वस्ति पूछती- ‘इसकी मम्मी इसे याद नहीं कर रही होगी?

रश्मि कहतीं- ‘अगर पता हो कि इसकी मां कौन है, तो  फौरन मां-बेटे को मिलवा दूं।
‘ये पूसा इससे क्यों नाराज रहती है।
दोनों बच्चे पूछते। ‘अरे भाई, घर में अब तक सब उसे ही प्यार करते थे। अब उसके प्यार में हिस्सा बंटाने यह आ गया।

‘हां, जैसे कि मेरे प्यार में हिस्सा बंटाने के लिए यह।
-नक्षत्र ने स्वस्ति की तरफ इशारा करते हुए कहा तो स्वस्ति ठुनकने लगी। एक सवेरे, छुट्टी के दिन, घर में सामान आया था, रश्मि दरवाजा बंद करना भूल, जाकर सामान अंदर रखने लगीं। तभी स्वस्ति जोर से चिल्लाई, ‘मम्मी, जल्दी आकर देखो। पूसा क्या कर रही है।

रश्मि को लगा, जरूर पूसा मंकी को तंग कर रही होगी या उसका खाना खा गई होगी। लेकिन आकर देखतीं क्या हैं कि मंकी बार-बार बाहर जाने की कोशिश कर रहा है और पूसा उसकी पूंछ मुंह में दबाकर दरवाजे के अंदर खींच रही है। यह देखकर सुरेंद्र बोले- ‘पूसा को पता है कि यह भी अपने घर का सदस्य है। घर से बाहर निकलकर अगर सीढिय़ों से नीचे गिर गया, तो चोट लग जाएगी न। वह मंकी को बचाकर, अपना कर्तव्य निभा रही है।

पापा की बात सुनकर बच्चे ताली बजाकर हंसे। बोले-यानि कि आज से ये दोनों दोस्त बन गए। पूसा की नाराजगी खत्म।
-क्षमा शर्मा

श्री रामचरितमानस की सीख

सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।

यदि मंत्री भय के कारण मीठा बोले तो राच्य का नाश हो जाता है। वैद्य के भयभीत होकर बोलने से शरीर का और गुरु यदि शिष्य से भय के कारण शिष्य को प्रिय लगने बाली भाषा बोले तो धर्म का नाश हो जाता है। जिसके राच्य में सुखेण वैद्य का कोई उपयोग ही नहीं था, बेचारा हाथ जोड़े खड़ा रहता था और त्रिभुवन गुरु शंकरावतार श्रीहनुमान जी का लंका में सामूहिक अपमान हुआ, और उचित सलाह देने बाले मंत्री विभीषण को भरी सभा में छाती पर रावण का चरण प्रहार सहना पड़ा हो तो लंका का विनाश तो अवश्यंभावी ही था। जब व्यक्ति की बुद्धि कुमतिपूर्ण हो जाती है तो उसे किसमें अपना हित है और किसमें अहित है, यही समझ नहीं आता है। जब हनुमान जी, विभीषण और मंदोदरी तीनों ने वही राम भक्ति की सलाह रावण को दी, जिसका पालन स्वयं इन तीनों ने अपने जीवन में किया था। पर यदि रावण में बुद्धि के स्थान पर संस्कार होते तो वह यह अवश्य समझने की चेष्टा करता की बाहर से आया हुआ एक बंदर और मेरे भाई और भार्या तीनों के द्वारा मुझे न प्रिय लगने बाली बात कही जा रही है, अवश्य ही कोई कारण होगा, और वह असद् कृत्य से विरत होकर सद् में लग कर धन्य हो जाता।
-संत मैथिलीशरण