स्वार्थ से दूर | सच्चे दोस्त की हुई पहचान

नीलेश के पिता का स्थानांतरण नए शहर में हुआ तो नीलेश उदास हो गया। अपना प्रिय स्कूल, मित्र और शहर छोडऩे का उसे बेहद अफसोस था। लेकिन नए शहर में आकर जब वह पहली बार स्कूल गया तो उसकी उदासी बहुत हद तक कम हो गई। पहले ही दिन उसकी मित्रता प्रणव और रूपेश से हुई। दोनों ही उसकी तरह पढऩे-लिखने में होशियार थे और साथ ही वे देर तक नीलेश से बातें करते रहे तो नीलेश उस नए स्कूल में भी बहुत सहज महसूस करने लगा। कुछ दिन बीते तो उसने दोनों मित्रों को अपने घर बुलाया। माता-पिता से मिलवाने के बाद वह उन्हें अपने दादाजी से  मिलवाने ले गया। दादा जी बहुत देर तक उनके साथ बातें करते रहे। जाने से पहले दोनों मित्रों ने रात का भोजन नीलेश के घर पर ही किया। जब वे चले गए तो नीलेश ने अपने दादा जी से पूछा कि उन्हें उसके नए मित्र कैसे लगे? दादा जी ने कहा कि प्रणव हमेशा नीलेश का साथ निभाएगा और उनकी दोस्ती जीवन भर बनी रहेगी। लेकिन रूपेश से दोस्ती लंबे समय तक नहीं चलेगी। नीलेश ने आश्चर्य प्रकट करते हुए पूछा, ‘आप यह कैसे कह सकते हैं?Ó तो दादाजी ने उत्तर देते हुए कहा,  ‘मैं अपने अनुभव के आधार पर इस निर्णय पर पहुंचा हूं। वे दोनों काफी देर तक यहां रहे और उन्होंने जो कुछ कहा और किया, उसके आधार पर मैं कह सकता हूं कि उनमें से कौन तुम्हारा साथ हमेशा निभाएगा। जब हम भोजन कर रहे थे तो मैंने देखा कि रूपेश का पूरा ध्यान भोजन पर ही था। उसे इस बात की बिल्कुल चिंता नहीं थी कि दूसरे लोग क्या कर रहे हैं। जब तुम्हारी माताजी रोटियां लेकर आतीं, तब रूपेश तुरंत ही अपने लिए रोटियां ले लेता, लेकिन प्रणव इस बात का ध्यान रख रहा था कि दूसरे लोगों को रोटियां पहले मिल जाएं, उसके बाद वह अपने लिए ले। एक बात और थी। डाइनिंग टेबल पर कुछ चीटियां आ गई थीं। मैंने देखा कि प्रणव ने बहुत सावधानी से उन्हें नुकसान पहुंचाए बिना वहां से उन्हें हटा दिया, लेकिन जो चीटियां रूपेश की प्लेट के पास थीं, रूपेश ने उन्हें पेपर नैपकिन से दबाकर मार डाला। जो व्यक्ति केवल अपने पोषण के बारे में सोचता है और दूसरे जीवों के प्रति जिसके हृदय में निर्दयता है, वह व्यक्ति कभी अच्छा मित्र नहीं बन सकता। इसीलिए मैंने निर्णय लिया कि प्रणव से तुम्हारी मित्रता हमेशा रहेगी और रूपेश के साथ तुम्हारी मित्रता सीमित समय तक ही बनी रह पाएगी।Ó  नीलेश ने अपने दादाजी की सारी बातें ध्यान से सुनीं। लेकिन इतनी छोटी बातों के आधार पर उसे किसी निर्णय पर पहुंचना ठीक नहीं लगा, इसलिए उसने रूपेश और प्रणव के साथ अपने व्यवहार को पहले जैसा ही बनाए रखा। कुछ समय बीता और देखते ही देखते परीक्षाएं पास आ गईं। परीक्षाएं बीतीं और उनके परिणाम भी आ गए। तीनों ही बहुत अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण हुए। एक दिन तीनों ने तय किया कि पास के जंगल में जो झरना है, वहां चलकर पिकनिक मनाई जाए। तीनों अपनी-अपनी साइकिल पर सवार होकर झरने के पास पहुंचे। घर से तीनों ही अपनी अपनी पसंद की चीजें बनवा कर लाए थे। वे अपना टिफिन बॉक्स खोल ही रहे थे कि अचानक नीलेश के हाथ से उसका टिफिन बॉक्स गिर गया और सारा खाना जमीन पर फैल गया। नीलेश के चेहरे पर उदासी उतरी तो प्रणव ने कहा कि चिंता क्यों करते हो  मेरा और रूपेश का भोजन तो बिल्कुल सुरक्षित है, हम तीनों उससे काम चला लेंगे, लेकिन प्रणव की बात सुनकर रूपेश ने तुरंत कहा, ‘नहीं भाई, मैं तो केवल उतना ही लाया हूं, जितने में मेरा पेट भर सकता है। तुम चाहो तो तुम्हारा भोजन नीलेश को करवा दो। तुम दोनों तो जानते हो कि मैं भूखा रहता हूं तो मुझे बहुत गुस्सा आने लगता है। इसलिए मैं अपने खाने के मामले में कोई समझौता नहीं कर सकता।Ó प्रणव ने मुस्कराकर कहा, ‘कोई बात नहीं, हम दोनों मेरे भोजन में से ही आधा-आधा खा लेंगे।Ó रूपेश की बात सुनकर नीलेश के मन में उसके दादाजी की बात गूंज उठी। कुछ समय बाद तीनों नहाने के लिए झरने में उतरे। थोड़ी ही देर में प्रणव और रूपेश तो बाहर आ गए, लेकिन नीलेश झरने में खड़ा नहाता रहा। रूपेश और प्रणव ने अपने गीले कपड़े थैले में रखें और घर से लाए हुए कपड़े पहन लिए। तभी नीलेश चिल्लाया, ‘मेरा पांव किसी चीज में फंस गया है। बाहर नहीं निकल रहा। जल्दी आओ।Ó  नीलेश की बात सुनकर दोनों झरने की ओर दौड़े। रूपेश ने किनारे पर खड़े होकर कहा, ‘कोशिश करो, ठीक से कोशिश करो तो तुम बाहर आ सकते हो।Ó उसकी बात सुनकर प्रणव ने कहा, ‘यहां किनारे पर खड़े रहकर चिल्लाने से कुछ नहीं होगा। हमें उसके पास जाकर उसकी मदद करनी होगी।Ó  लेकिन रूपेश ने कहा, ‘पानी इतना गहरा नहीं है कि वह डूब जाएगा। पैर ही फंसा है। कोशिश करेगा तो आराम से निकल आएगा। हमें अपने कपड़े खराब करने की जरूरत नहीं है। वैसे भी अब हमारे पास सूखे कपड़े नहीं बचे हैं। हमारे कपड़े भीग गए तो हमें गीले कपड़ों में ही घर लौटना पड़ेगा और हमारी तबीयत खराब हो सकती है।Ó  प्रणव ने बहुत आश्चर्य के साथ उसकी ओर देखा और बिना वक्त गंवाए वह झरने में उतरा और नीलेश के पास जाकर उसने मदद की तो नीलेश का फंसा हुआ पैर बाहर आ गया। वह उसे सहारा देकर किनारे की ओर ले आया। नीलेश के पांव में काफी सूजन आ गई थी और उसे दर्द से कराहता देख प्रणव की आंखें छलक उठीं, लेकिन रूपेश ने हंसी उड़ाते हुए कहा, ‘तुम तो इतनी छोटी-सी बात पर ही घबरा गए और छोटे बच्चों की तरह चीख रहे थे।Ó नीलेश ने रूपेश की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। नीलेश की साइकिल वहीं एक चाय की दुकान पर रखकर प्रणव उसे अपनी साइकिल पर बैठाकर घर ले आया, लेकिन रूपेश सीधे अपने घर चला गया। प्रणव उसे घर पहुंचाकर जब अपने घर लौटा तो नीलेश ने अपने दादा जी से कहा, ‘दादाजी, आपका कहना बिल्कुल सही था। रूपेश केवल अपने बारे में सोचता है और उस वक्त भी दया नहीं दिखाता, जब उसका कोई दोस्त भी मुसीबत में फंसा हो। लेकिन प्रणव एक सच्चे दोस्त की तरह साथ निभाने वाला इंसान है। मैं आपके अनुभव को उस दिन स्वीकार नहीं कर पाया था, लेकिन अब मुझे स्वार्थी और नि:स्वार्थ मित्र के बीच का अंतर समझ में आ गया है। अब मैं दोस्ती करते वक्त हमेशा इस बात का ध्यान रखूंगा कि मैं जिससे दोस्ती करूं, वह स्वार्थ से दूर हो, क्योंकि ऐसा व्यक्ति ही सच्चा मित्र भी होता है और सच्चा इंसान भी । -अशोक जमनानी

श्री रामचरितमानस की सीख

सब बिधि सोचिअ पर अपकारी।
निज तनु पोषक निरदय भारी।।
सोचनीय सबहीं बिधि सोई।
जो न छाडि़ छलु हरि जन होई।।

श्रीरामचरितमास की उपर्युक्त पंक्तियां उस समय की हैं, जब भगवान राम के वन गमन के पश्चात गुरु वशिष्ठ दूतों के द्वारा श्री भरत को ननिहाल से बुलवाते हैं। श्री भरत के लौट आने पर महाराज श्री दशरथ की मृत्यु की सारी गाथा से व्याकुल श्री भरत को गुरुदेव बहुत प्रकार से समझाते हैं। वे कहते हैं कि किन लोगों के लिए मृत्यु के पश्चात शोक करना चाहिए और किन लोगों के लिए शोक करने की आवश्यकता नहीं है। महाराज श्री दशरथ की धन्यता का विस्तार से बखान करते हुए वह कहते हैं, भरत! शोक तो उसके लिए किया जाए, जो अपने शरीर का तो भरण-पोषण करे, पर दूसरों का अनिष्ट करे, और जरा भी दया भाव न रखे। शोक उसके लिए भी करना चाहिए, जो छल छोड़कर भगवान की भक्ति न करे। तुम्हारे पिता तो भगवान शंकर के महान भक्त और हर तरह से प्रजा का हित करने बाले थे। कदाचित वे इतने निश्छल थे कि उन्हें धर्म की दुहाई देकर छला गया है। यदि उनमें तनिक भी कपट या छल होता तो वे राम को वन भेजकर अपने प्रति इतना अन्याय न करते, जिसके कारण उन्होंने शरीर ही छोड़ दिया। चौदह भुवनों और तीनों कालों (भूत-वर्तमान और भविष्य)में ऐसा निश्छल राजा न तो हुआ, न है और न ही होगा। भरत! वे धन्य थे, जिनके पुत्र राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और तुम भरत हो!

– संत मैथिलीशरण (भाईजी)

स्वार्थ से दूर | सच्चे दोस्त की हुई पहचान

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