विवेक भैया की शादी थी। जिस होटल में बारात को ठहराया गया था, उसका इंतजाम देखकर कुछ लोग भला-बुरा कहने लगे, तो ताऊ जी ने उन्हें समझाया, ‘भाई, थोड़ा-सा समय ही तो काटना है। कौन-सा यहां जीवन बिताना है। मामूली-सी बात पर लड़की वालों को परेशान करने की जरूरत नहीं है। दूसरे की लड़की की शादी को अपनी लड़की की शादी ही समझना चाहिए। फिर वे लोग तो अपने रिश्तेदार हैं।’

खैर, बारात चढ़ने का समय आ गया तो सब लोग तैयार होकर नीचे आ गए। बैंड-बाजे की धुन पर नाचने लगे। अपनी फरमाइश का गाना बजाने की बातें करने लगे। पटाखों और आतिशबाजी से आसमान गूंजने लगा। खूब धूम-धड़ाका, आतिशबाजी। गेंदे और गुलाब के फूलों की बरसात। सफेद घोड़ी पर बैठे सेहरा पहने विवेक भैया अपने को किसी हीरो से कम नहीं समझ रहे थे। विवेक भैया से बारात में शामिल महिलाएं मजाक करने लगीं, ‘आज बैठ ले.., बैठ ले घोड़ी पर। कल जब घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी संभालेगा, तो पांव-पांव ही भागता फिरेगा।’ भैया भी अपनी चाची, ताई, मौसी की बातें सुनकर मुस्कुरा रहे थे।

शादी का सारा काम ताऊ जी के जिम्मे था। विवेक भैया के पापा से कोई कुछ पूछता, तो वह कहते- मेरे बड़े भाई से पूछो। शादी का सारा खर्चा कैसे होगा, कितने बाराती जाएंगे, दावत में क्या-क्या परोसा जाएगा। सब ताऊ जी यानी कि शिव प्रसाद ही बता रहे थे। ऐसा माहौल देखकर रीता दीदी के पति महेंद्र जीजा जी ने कहा था, ‘भाइयों में ऐसा प्यार तो पहली बार देख रहा हूं कि बड़े भाई से पूछे बिना छोटा भाई कुछ करने को भी तैयार नहीं।’

अचानक घोड़ी उछली और गिर पड़ी। भैया भी एक ओर गिरे। सब उन्हें उठाने दौड़े। उनके कपड़े भी गंदे हो गए। उधर, बैंडबाजे वाले थे कि खूब जोर-शोर से गाना बजा रहे थे और बहुत से लोग नाच भीरहे थे। भैया को संभालने लोग पहुंचे तो उन्होंने सभी को धक्का देकर एक तरफ कर दिया। गुस्से से बोले, ‘मुङो नहीं करनी शादी। अब इन गंदे कपड़ों में जाऊंगा शादी करने।’

ताऊ जी वहीं खड़े थे। भैया के पापा भी थे। ताऊ जी ने तौलिया गीला किया और भैया के कपड़े पोंछे। उनके हाथों पर भी मिट्टी लग गई थी, उन्हें धुलवाया। फिर कहा, ‘ऐसे समय बच्चों की तरह नाराजगी क्या शोभा देती है। घोड़ी का भी कोई कसूर नहीं। उसका पैर फिसल गया होगा। चलो बैठो।’ लेकिन भैया थे कि अड़ गए। खैर, जैसे-तैसे भैया को मनाया गया। शादी की रस्में पूरी हुईं और सवेरे बारात विदा हो गई।

अगले दिन ताऊजी ने कहा, ‘मुङो पता है। घोड़ी क्यों गिरी थी।’
सब पूछने लगे, ‘क्यों गिरी थी?’

‘पड़ोसी लालता ने उसकी पीठ पर जलती हुई सिगरेट लगा दी थी और इसके बाद वहां से गायब हो गया था।’
यह सुनकर विवेक भैया बोले, ‘आपने तब क्यों नहीं बताया?’

‘बताता तो शादी में विघ्न न पड़ जाता। मजाक भी करना था, तो जानवर को सताकर। तुङो भी चोट लग सकती थी।’ सब ताऊ जी की तारीफ करने लगे कि उन्हें गुस्सा नहीं आता।

उनकी बात रीता दीदी का छोटा बेटा राहुल सुन रहा था। उसने पूछा, ‘आपको गुस्सा नहीं आता?’

‘क्यों नहीं आता। दुनिया में ऐसा कौन है, जिसे गुस्सा न आता हो। लेकिन गुस्सा आने से बना-बनाया काम बिगड़ जाए, तो क्या फायदा? औरों की तरह मैं भी उस समय गुस्सा करने लगता, तो बताओ शादी आराम से कैसे निपटती?’

‘मुङो भी अपने दोस्तों पर बहुत गुस्सा आता है’- राहुल ने ठुनकते हुए कहा। रीता दीदी हंसकर बोलीं- ‘ताऊ जी, इसे भी सिखा दीजिए कि गुस्सा कैसे कम आए। आए दिन इसकी अपने दोस्तों से लड़ाई हो जाती है।’

ताऊ जी ने हंसते हुए राहुल से कहा- ‘जिस वक्त कोई दोस्त परेशान करे, उस समय बिल्कुल भी गुस्सा न करो। क्या पता, गुस्से जैसी कोई बात ही न हो। थोड़ी देर में गुस्सा अपने आप भाग जाएगा। दोस्तों से दोस्ती भी बनी रहेगी।’

ताऊ जी की बात सुनकर विवेक भैया और बाकी सब हंसकर कहने लगे- ‘बात तो ठीक है। आप हमारे साथ ही रहिए तो हम सब गुस्सा करना ही भूल जाएंगे।’

‘नहीं, आप मेरे साथ रहेंगे। मैं भी आपसे सीखूंगा कि कैसे नाराज नहीं होना है।’ राहुल ने यह कहा, तो ताऊजी ने उसे प्यार से गोद में उठा लिया। कहा- ‘अच्छा मेरे शैतान बंदर। और मैं तुमसे सीखूंगा कि फुटबाल में कैसे जोरदार किक मारनी है। बोलो मंजूर।’

राहुल बोला – ‘मंजूर।’

क्षमा शर्मा

रामचरित मानस की सीख

बैखानस सोइ सोचै जोगू।
तप बिहाइ जेहि भावइ भोगू।।

सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी।
जननि जनक गुर बंधु बिरोधी।।

सब बिधि सोचिअ पर अपकारी।
निज तनु पोषक निरदय भारी।।

सोचनीय सबहीं बिधि सोई।
जो न छांड़ि छलु हरि जन होई।।

सोचनीय नहिं कोसलराऊ।
भुवन चारि दस प्रगट प्रभाउ।।

भयउ न अहइ न अब होनिहारा।
भूप भरत जस पिता तुम्हारा।।

रामचरित मानस के अयोध्या कांड की उक्त चौपाई के अनुसार, महाराज श्री दशरथ जी के राम वियोग में शरीर त्याग के पश्चात जब भरत ननिहाल से लौटकर अयोध्या आते हैं, तब पिता की मृत्यु और राम के वन गमन के दोहरे दुख को निमरूल करने के लिए गुरु वशिष्ठ विस्तार से उन्हें समझाते हैं :

भरत! तुम ज्ञानी हो, तुम्हें भूतोन्मुख शोक नहीं करना चाहिए। भूतोन्मुख क्रोध, भूतोन्मुख शोक और भविष्योन्मुख लोभ करना उचित नहीं होता है, क्योंकि उस पर हमारा या किसी का वश नहीं होता है। और फिर, तुम्हारे पिता श्री दशरथ ने अपने पूरे जीवन को सार्थक किया, जिसके कारण वे कदापि शोक करने योग्य नहीं हैं। तो अब तुम शोक करके समय को व्यर्थ मत गंवाओ, क्योंकि जीवन में सबसे बहुमूल्य केवल समय ही होता है और उसके मूल्यांकन का समय केवल वर्तमान ही है। शोक तो उस गृहस्थ के लिए करना चाहिए, जो मोहग्रस्त होकर अपने कर्म पथ का त्याग कर दे। शोक उस संन्यासी के लिए भी किया जाना चाहिए, जो लोक हित और तपस्या की जगह भोगों के संग्रह में सुख का अनुभव करने लगे। कदाचित उस व्यक्ति की मृत्यु पर भी शोक करना चाहिए, जो दूसरों का अहित करने के लिए अपने से बड़ों को किसी की चुगलखोरी करके दिग्भ्रमित करता है और माता, पिता, भाई-बंधु और यहां तक कि गुरु से भी विरोध करता है। जो अपना हित करने के लिए छल-कपट के साथ दूसरों का अहित करता है और भगवान का भजन नहीं करता है, वह शोचनीय है। भरत! संसार के इतिहास में तुम्हारे पिता दशरथ के समान न तो कोई हुआ, न है और अब न ही कोई होगा, तो अब तुम अपने वेदोक्त, शास्त्रोक्त कर्तव्य कर्म को करके तीनों कालों का सदुपयोग करो। राम के आदर्शपूर्ण गृह-त्याग को अयोध्या में रहकर राम के आदर्श की स्थापना में सहयोग करो।

संत मैथिलीशरण (भाई जी)