अच्छी संगति का महत्व : अच्छाई का उजाला

बंसी अभी-अभी दोस्तों के साथ देर तक खेलने के बाद घर लौटा था, लेकिन घर लौटकर भी उसका मन दोस्तों के बीच ही था। कितना मजा आ रहा था दोस्तों के साथ। उसका मन खिन्न हो उठा। अब मां कहेंगी कि चलो पढ़ाई करने बैठो। पढ़ाई-पढ़ाई-पढ़ाई। बंसी को अब इस शब्द से ही नफरत हो गई है। वह अभी खयालों में डूबा हुआ ही था कि मां ने दूध से भरा गिलास उसके सामने रख दिया। पढ़ाई के बाद उसे जो सबसे अधिक बुरा लगता है, वह है दूध। लेकिन मां तो वही सारे काम करवाती हैं, जो उसे बुरे लगते हैं। उसने मुंह बनाया ही था कि मां ने कहा, ‘जल्दी से दूध पी लो। फिर पढऩे बैठना है। तुम पढ़ाई में पिछड़ते ही जा रहे हो।Ó मां की बात सुनकर बंसी अचानक गुस्से से भर गया। उसने दूध के गिलास को दीवार की ओर फेंका और चिल्लाया- ‘नहीं पीना है मुझे दूध और नहीं करनी है पढ़ाई।Ó मां आश्चर्य के साथ उसकी ओर देख ही रही थीं कि बाबूजी बाहर आए और उन्होंने आव देखा न ताव और दो चांटे बंसी को जड़ दिए। बंसी देर तक सुबकता रहा, फिर तेजी से घर से बाहर निकला और स्टेशन आ गया। उसने मन ही मन तय कर लिया कि अब वह कभी घर नहीं लौटेगा। वह सोच ही रहा था कि कौन-सी ट्रेन में बैठना है कि तभी उसके साथ पढऩे वाले मोहित और सोहित वहां आ गए। वे दोनों स्कूल के सबसे अधिक बदमाश लड़के थे और सारे बच्चे दोनों से बहुत डरते थे। उनके पूछने पर बंसी ने बताया कि वह मुंबई जा रहा है। दोनों ने जब पूछा कि टिकट और वहां खर्चे के लिए पैसे हैं, तो बंसी ने इन्कार में सिर हिला दिया। मोहित ने तुरंत सलाह देते हुए कहा कि सामने बैठे बुज़ुर्ग को वे दोनों बातों में उलझाएंगे और बंसी इसी बीच उनका बैग गायब कर दे। दोनों ने कहा कि बैग लेकर बंसी पुल के पास आधे घंटे के बाद मिले तो वे उसे एक हजार रुपये दे देंगे। दोनों ने इतनी चतुराई से बंसी को समझाया कि वह उनकी बातों में आ गया और कुछ देर बाद ही उसने बुज़ुर्ग यात्री का बैग चुरा लिया। डरते-डरते वह पुल के पास मोहित सोहित का इंतजार कर रहा था, तभी उसे गोपाल आता हुआ दिखाई दिया। गोपाल उसकी क्लास का सबसे अधिक योग्य विद्यार्थी है। गोपाल पास आया तो बंसी ने उससे पूछा कि वह इस समय कहां जा रहा है? गोपाल ने उसे बताया कि वह स्टेशन पर फल बेचकर अपना गुजारा करता है। दिन में पढ़ाई करता है और शाम को फल बेचता है। बंसी ने कहा, लेकिन अब तो रात हो गई है, तब गोपाल ने बताया कि आज उसके फल के ठेले के पास एक व्यक्ति अपना बैग भूल गया। गोपाल उसे रेलवे के थाने में जमा करवा कर लौट रहा है। बंसी ने बहुत आश्चर्य के साथ पूछा कि तुमने वह बैग अपने पास क्यों नहीं रख लिया? तो गोपाल ने कहा कि बेईमानी से हासिल किया हुआ कोई भी धन या वस्तु उसके जीवन को नीचे गिरा देंगे। गोपाल की बात सुनकर बंसी जैसे नींद से जागा। उसकी आंखों से आंसू छलक उठे। उसने तुरंत ही निर्णय लिया और बैग लेकर उस बुजुर्ग यात्री के पास चला गया। बैग लौटाकर उसने उनसे माफी मांगी तो बुजुर्ग ने पूरी बात सुनकर कहा कि तुम बहुत खुशनसीब हो कि तुम्हें बुरे लोगों के बाद कोई अच्छा दोस्त मिल गया। बुरे लोगों ने काले बादलों की तरह आकर तुम्हारे जीवन में बुराई का अंधकार भर दिया था, लेकिन अच्छे दोस्त ने सूरज की तरह आकर अच्छाई का उजाला फैला दिया। उनकी बात सुनकर बंसी घर लौटा तो देखा कि मां का रो-रो कर बुरा हाल हो चुका है। उसे देखकर मां और बाबू जी दोनों बहुत खुश हुए और दोनों ने ही उसे गले लगा लिया। रात में सोते वक्त बंसी के कानों में उस बुजुर्ग की बात गूंजने लगी और उसने तय कर लिया कि कभी अपने जीवन में ऐसे लोगों को साथ नहीं रखेगा, जो उसे बुराई के रास्ते पर ले जाएं। वह अच्छी तरह से समझ चुका था कि बुरे लोगों का साथ काले बादलों की तरह जीवन को अंधकार से भर देता है और अच्छे लोगों का साथ जीवन में सूरज की तरह उजाला ले आता है।

– अशोक जमनानी

रामचरित मानस की सीख

कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं।
जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं।।
कबहुँ दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग।
बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग।।

श्रीरामचरितमानस में भगवान राम अपने अनुज लक्ष्मण से कहते हैं, देखो लक्ष्मण! तेज आकाश में कभी तेज वायु के प्रभाव से बादल छिन्न-भिन्न हो जाते हैं, जैसे किसी परिवार में कभी कुपुत्र का जन्म हो जाने से सुसंस्कारित और श्रेष्ठ आचरण का नाश हो जाता है और कभी बादलों के होने से सूर्य का प्रकाश आकाश में वैसा ही नहीं दिखाई देता है, जैसे कुसंग पाकर व्यक्ति का ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर उत्पन्न हो जाता है। जीवन में जब वासना की तेज आंधी आती है तो जो पूर्व में सुना या पढ़ा हुआ ज्ञान वैसे ही उड़ जाता है, जैसे आकाश से बादल उड़ जाते हैं। यह उसी तरह की बात है कि कितना भी सुंदर पुलस्त्य की तरह वंश क्यों न हो, तो भी रावण रूप कुपुत्र के उत्पन्न होने से पूरे वंश का यश समाप्त हो गया। ये वे ही लोग होते हैं, जो कभी दिन में प्रकाश के समय भी कभी कभी बादलों के रूप में आकाश में घिर जाते हैं और ज्ञान रूप सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी पर आने नहीं देते हैं। निजी स्वार्थ के बादल जब जीवन के ज्ञान सूर्य को घेर लेते हैं तो अज्ञान का अंधकार ऐसा फैलता है कि राजा बलि के ज्ञान प्रकाश की पृथ्वी को भी ढकना चाहते हैं, पर भक्त प्रह्लाद के पौत्र होने के कारण सत्संग के पूर्व में सत्संग संस्कार होने के कारण वह उससे उबरकर भगवान को समर्पित होकर धन्य हो गया, नहीं तो वह भी अंधकार के गर्त में चला जाता। ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग । होइ कुवस्तु सुवस्तु जिमि लखविन्द्र सुलच्छन लोग।। घर, औषधि, पानी, कपड़ा और हवा संयोग से कु या सु हो जाती है। कु माने कुवस्तु और सु माने सुवस्तु। उसका अपना कोई न तो गुण होता है और न ही अवगुण। वह तो जहां जिस संगत से हवा बहकर आएगी, वह सुगंध भी ला सकती है और दुर्गन्ध भी ला सकती है।
संत मैथिलीशरण (भाई जी)

अच्छी संगति का महत्व | अच्छाई का उजाला

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