मित्रता का अनुशासन : सबसे बड़ी उपलब्धि

आकाश और पवन की दोस्ती पूरे विद्यालय में प्रसिद्ध थी। दोनों साथ-साथ विद्यालय आते, साथ ही बैठते, साथ खेलते, एक साथ भोजन करते और जब घर लौटते तो भी साथ ही होते। आश्चर्य की बात यह थी कि परीक्षा में दोनों के अंक भी लगभग समान ही होते थे। सबने उनका नाम रख दिया था – जुड़वा। आकाश पवन जुड़वा। दोनों यह नाम सुनकर कभी बुरा नहीं मानते थे, बल्कि सुनकर हंसते थे। दोनों के परिवार की आर्थिक स्थिति भी लगभग समान ही थी। साधारण आर्थिक स्थिति के बावजूद दोनों के परिवार सदैव उनकी जरूरतें पूरी कर देते थे और उन्हें किसी भी अभाव का सामना नहीं करना पड़ता था। दोनों के परिवारों को उनसे बहुत उम्मीद थी। देखते ही देखते बहुत वक्त बीत गया और दोनों बारहवीं कक्षा में आ गए। सबको लगता था कि इन दोनों में से कोई एक, न केवल विद्यालय में बल्कि पूरे जिले में प्रथम स्थान प्राप्त करेगा।
दोनों की दोस्ती अब भी उतनी ही गहरी थी, लेकिन अब उनकी इस दोस्ती में चंचल भी शामिल हो गया था। उसके पिता का तबदला यहां हुआ था, इस कारण उसने इसी वर्ष उनके विद्यालय में दाखिला लिया था। कहने को उसकी दोस्ती दोनों से हुई, लेकिन पवन के साथ उसका जुड़ाव अधिक था और पवन भी उसे अधिक समय देता था। सब कहते थे कि अब आकाश और पवन की दोस्ती टूट जाएगी, क्योंकि चंचल के पिता बहुत बड़े अधिकारी थे और वे पवन से कहते रहते थे कि चंचल को पढऩे में मदद करे। इस कारण पवन अक्सर उसके घर चला जाता और पढ़ाई में उसकी मदद कर दिया करता था और उसके साथ वक्त भी बिताता था।
समय तेजी से बीता और परीक्षा में कुछ ही समय शेष था कि अचानक आकाश की तबीयत बहुत अधिक बिगड़ गई। पहले तो हल्का बुखार रहा, लेकिन धीरे-धीरे बुखार बढ़ता गया और कई डॉक्टरों के इलाज के बाद भी जब वह ठीक नहीं हुआ तो उसके माता-पिता उसे लेकर दिल्ली चले गए। वहां के बड़े अस्पताल में इलाज से आकाश की तबीयत तो ठीक हो गई, लेकिन इलाज करने वाले डॉक्टर ने लौटते वक्त कह दिया कि वो घर पर रहकर आराम करे। बाहर जाने, खेलने-कूदने या विद्यालय जाने से बुखार फिर से आ सकता है। आकाश के माता-पिता भी आकाश की लंबी बीमारी के कारण बहुत अधिक भयभीत हो गए थे। उन्होंने भी सोचा चाहे इस साल आकाश परीक्षा न दे पाए, लेकिन वे उसके स्वास्थ्य से खिलवाड़ नहीं करेंगे। इधर विद्यालय में शिक्षक तेजी से पढ़ाई पूरी करवा रहे थे और महत्वपूर्ण प्रश्न भी लिखवा रहे थे। एक दिन चंचल ने पवन से कहा, ‘तुम्हारी किस्मत बहुत अच्छी है। आकाश तो बीमार हो गया है। वह न तो विद्यालय आ रहा है और न ही घर पर पढ़ाई कर पाएगा। साथ ही शिक्षक जो महत्वपूर्ण प्रश्न बता रहे हैं, वह उन्हें भी समझ नहीं पाएगा। अब तो तुम निश्चितत रूप से जिले में प्रथम स्थान प्राप्त करोगे।Ó उसकी बात सुनकर पवन ने कहा कि उसे पूरी उम्मीद है कि आकाश परीक्षा से पहले अवश्य ठीक हो जाएगा। चंचल ने पवन की बात सुनकर कहा कि वह बिलकुल मूर्ख है। जीवन के इतने बड़े अवसर को भुनाने के स्थान पर वह अपने सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी के लिए दुआ मांग रहा है। चंचल की बात सुनकर पवन देर तक यह सोचता रहा कि क्या चंचल सही कह रहा है और वह स्वयं गलत है । देर तक सोचने के बाद भी उसने चंचल को कोई उत्तर नहीं दिया।
कुछ वक्त और बीता और परीक्षा आते-आते आकाश की तबीयत पूरी तरह ठीक हो गई। परीक्षा बीती। सबको लग रहा था कि पवन ही जिले में प्रथम स्थान प्राप्त करेगा, लेकिन जब परिणाम आया तो सभी आश्चर्य में डूब गए। आकाश प्रथम स्थान पर था और पवन उससे एक अंक कम लेकर दूसरे स्थान पर था। जब विद्यालय में दोनों का सम्मान किया जा रहा था, तब आकाश ने कहा, ‘मैं यदि प्रथम स्थान प्राप्त कर सका हूं तो उसका कारण है पवन की नि:स्वार्थ मित्रता। मेरे बीमार होने पर पवन प्रतिदिन मेरे पास आकर विद्यालय में होने वाली पूरी पढ़ाई के बारे में मुझे बताता था और अपनी तैयारी छोड़कर वह मेरी तैयारी करवाता था। वह चाहता तो महत्वपूर्ण प्रश्न और विद्यालय में करवाई गई तैयारी मुझे न बताकर बहुत आसानी से प्रथम स्थान प्राप्त कर सकता था। लेकिन उसने न केवल मेरी तैयारी करवाई, बल्कि बीमारी के कारण मैं चिड़चिड़ा हो गया था और पवन पर बेवजह भी चिल्लाने लगता था। उस हालत में पवन ने मेरी उन सारी कमजोरियों को भी हंसते-हंसते सहा और हमेशा सबको मेरी अच्छाइयों के बारे में ही बताया। पवन केवल मेरी तैयारी ही नहीं करवाता था, बल्कि हमेशा से सौ गुना अधिक मेरा ध्यान रखता था। एक सच्चे दोस्त को कैसा होना चाहिए, यह मैंने पवन से ही सीखा है। आज मैं पूरे गर्व के साथ कह सकता हूं कि पवन मेरा सबसे अच्छा दोस्त है। और मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि जिले में प्रथम आना नहीं है, बल्कि पवन से मेरी दोस्ती ही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है।Ó यह कहकर आकाश ने अपने गले में पड़ी हुई पुष्पमाला पवन के गले में डालकर उसे गले लगाया तो सारा विद्यालय तालियों से गूंज उठा ।
– अशोक जमनानी

रामचरित मानस की सीख

जिन्ह कें असि मति सहज न आई।
ते सठ कत हठि करत मिताई।।
कुपथ निवारि सुपंथ चलावा ।
गुन प्रगटे अवगुनन्हि दुरावा।।
देत लेत मन संक न धरई।
बल अनुमान सदा हित करई।।
बिपति काल कर सतगुन नेहा।
श्रुति कह संत मित्र गुन एहा ।।

यहां पर सुग्रीव को आश्वासन देते हुए भगवान राम संत और मित्र के गुणों को एक करके यह बताना चाह रहे हैं कि वस्तुत: मित्रता का निर्वहन तो संत ही करता है, या फिर जो ऐसा करे, वह संत है। संत किसी वेश का नाम न कभी था, न ही है। वह तो चरित्र का नाम है। जो अपने मित्र के दोष को छुपाए और गुणों को सार्वजनिक करे। उसे कुपंथ से निकालकर श्रेष्ठ मार्ग पर लगाने में पूरा सहयोग दे, ताकि मित्र का चरित्र सार्वजनिक करने में संकोच न हो। और एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात भी कही कि मित्र को मित्र से कुछ लेने और देने में संकोच नहीं करना चाहिए।
यदि एक मित्र हमेशा देता रहे और दूसरा लेता रहे तो लेने वाले मित्र में हीनता का भाव आए बगैर नहीं रहेगा। इसीलिए भगवान ने सुग्रीव को दिया भी और वे यदि सीता जी की खोज में कुछ योगदान दे सकते हैं और यदि उससे उनका स्वाभिमान बना रहता है तो उनकी सेवा लेना राम और रामराच्य की विचारधारा के अंतर्गत है। दीन बनाकर देना सांसारिकता है और विश्वास जीतकर लेना और देना साधुता है। जिन लोगों में ऐसी बुद्धि नहीं आई है, वे लोग संसार में मित्रता के नाम पर व्यवसाय ही कर रहे हैं और अनावश्यक दंभ का प्रचार कर रहे हैं कि हमें कुछ नहीं चाहिए।
संत मैथिलीशरण (भाई जी)